प्रेम के दिन मनाई जाती है बसन्त पंचमी पढ़िए क्यो होती है कामदेव ओर रति की पूजा

जिंदगी में नई उमंग भरने के लिए बसंत का त्योहार आ चुका है। इस साल यह त्योहार 30 जनवरी को मनाया जाएगा। उत्तर भारत के कई राज्यों में बसंत पंचमी को श्री पंचमी, वसंत पंचमी और सरस्वती पंचमी के नाम से भी जाना है। 
फूलों की वर्षा, शरद की फुहार
सूरज की किरणें, खुशियों की बहार
चन्दन की खुशबू, अपनों का प्यार
मुबारक हो आप सबको, बसंत पंचमी का त्योहार!सरस्‍वती को नमन करने और पूजन करने का त्‍योहार बसंत पंचमी माघ मास के शुक्‍ल पक्ष की पंचमी को देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है। इस त्‍योहार से बसंत ऋतु के आगमन की शुरुआत मानी जाती है। इस साल बसंत पंचमी 30 जनवरी को मनाई जाएगी। बसंत पंचमी को मां सरस्‍वती के अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन मंदिरों, विद्यालयों और अन्‍य धार्मिक स्‍थलों पर मां सरस्‍वती की पूजा होती है। मगर क्‍या आप जानते हैं बसंत पंचमी पर सरस्‍वती माता के अलावा कुछ अन्‍य देवी-देवताओं को भी पूजा जाता है। आइए जानते हैं इनके बारे में खास बातें…



1/5रति और कामदेव की पूजा


 



(आँचल त्यागी)


बसंत पंचमी पर कामदेव और उनकी पत्‍नी रति की भी पूजा होती है। कामदेव और रति को पुराणों में प्रेम और यौन संबंध के देवी-देवता के रूप में बताया गया है। बसंत पचंमी के दिन कामदेव और रति ऋतुराज बसंत के साथ पृथ्वी पर आते हैं और मनुष्यों ही नहीं धरती के सभी जीव जंतुओं के हृदय में प्रेम और यौन भावनाओं को जागृत करने का काम करते हैं।



2/5मां सरस्‍वती को सौंपा गया यह दायित्‍व


 


मां सरस्‍वती के प्रकट होने के बाद सृष्टि के रचियता उनके पिता ब्रह्माजी ने उन्‍हें समस्‍त मानवजाति को ज्ञान और बुद्धि प्रदान करने का दायित्‍व सौंपा। काम भाव मनुष्य पर हावी ना हो जाए इसलिए ही देवी सरस्वती मनुष्यों में ज्ञान और विवेक जगाने के लिए प्रकट हुईं थी। इसलिए कामदेव और रति के साथ बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती की पूजा की जाती है।


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3/5राधा-कृष्‍ण की आराधना


 


 


पवित्र प्रेम के प्रतीक माने जाने वाले भगवान कृष्‍ण और राधाजी की पूजा भी बसंत पंचमी के दिन की जाती है। द्वापर युग में राधा और श्रीकृष्ण प्रेम के देवी-देवता के रूप में प्रकट हुए थे। बसंत पंचमी के दिन से ही श्रीकृष्ण और देवी राधा की होली शुरू हो जाती थी इसलिए बसंत पंचमी के दिन गुलाल लगाने की भी परंपरा इस देश में सदियों से चली आ रही है। शायद यही वजह है कि भारतीय संस्कृति में बसंत पंचमी सरस्वती पूजन और प्रेम दिवस के रूप में भी मनाने की परंपरा रही है।


4/5भगवान विष्‍णु की उपासना



बसंत पंचमी के अवसर पर भगवान विष्‍णु की उपासना का भी विशेष महत्‍व माना जाता है। इस दिन प्रात: उठकर पूरे शरीर पर तेल की मालिश करने के बाद स्‍नान करना चाहिए। इसके बाद घर के सभी लोगों को पीले वस्‍त्र धारण करके भगवान विष्‍णु की मूर्ति का श्रृंगार करना चाहिए और भगवान को भी पीले वस्‍त्र पहनाने चाहिए। उसके बाद विधिविधान से पूजा करने के बाद पीले मिष्‍ठान और पीले फल अर्पित करने चाहिए।


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5/5होली का आरंभ



बसंत पंचमी के दिन से बृज क्षेत्र में होलिकोत्‍सव का शुभारंभ माना जाता है। इस दिन से ही होलिका दहन के लिए चौराहों पर लकड़ी एकत्र करना शुरू हो जाती है। गुलाल उड़ाकर बसंत ऋतु का स्‍वागत किया जाता है। यह उत्‍सव का माहौल फाल्‍गुन मास की पूर्णिमा तक चलता है।
बसंत पचंमी के दिन कामदेव और रति ऋतुराज बसंत के साथ पृथ्वी पर आते हैं,                   


मां सरस्‍वती के प्रकट होने के बाद सृष्टि के रचियता उनके पिता ब्रह्माजी ने उन्‍हें समस्‍त मानवजाति को ज्ञान और बुद्धि प्रदान करने का दायित्‍व सौंपा। काम भाव मनुष्य पर हावी ना हो जाए इसलिए ही देवी सरस्वती मनुष्यों में ज्ञान और विवेक जगाने के लिए प्रकट हुईं थी। इसलिए कामदेव और रति के साथ बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती की पूजा की जाती है।


द्वापर युग में राधा और श्रीकृष्ण प्रेम के देवी-देवता के रूप में प्रकट हुए थे। बसंत पंचमी के दिन से ही श्रीकृष्ण और देवी राधा की होली शुरू हो जाती थी इसलिए बसंत पंचमी के दिन गुलाल लगाने की भी परंपरा इस देश में सदियों से चली आ रही है। शायद यही वजह है कि भारतीय संस्कृति में बसंत पंचमी सरस्वती पूजन और प्रेम दिवस के रूप में भी मनाने की परंपरा रही है।                     बसंत पंचमी के अवसर पर भगवान विष्‍णु की उपासना का भी विशेष महत्‍व माना जाता है। इस दिन प्रात: उठकर पूरे शरीर पर तेल की मालिश करने के बाद स्‍नान करना चाहिए। इसके बाद घर के सभी लोगों को पीले वस्‍त्र धारण करके भगवान विष्‍णु की मूर्ति का श्रृंगार करना चाहिए और भगवान को भी पीले वस्‍त्र पहनाने चाहिए। उसके बाद विधिविधान से पूजा करने के बाद पीले मिष्‍ठान और पीले फल अर्पित करने चाहिए।    बसंत पंचमी के दिन से बृज क्षेत्र में होलिकोत्‍सव का शुभारंभ माना जाता है। इस दिन से ही होलिका दहन के लिए चौराहों पर लकड़ी एकत्र करना शुरू हो जाती है। गुलाल उड़ाकर बसंत ऋतु का स्‍वागत किया जाता है। यह उत्‍सव का माहौल फाल्‍गुन मास की पूर्णिमा तक चलता है।